19 Sep 2026
भागलपुर, 19 सितंबर (एजेंसी)। जिले में गंगा और कोसी नदियों के उफान ने इस साल तबाही का ऐसा मंजर दिखाया है, जिसने पिछले कई सालों के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। यद्यपि पिछले 27 घंटों में गंगा के जलस्तर में करीब 12 सेंटीमीटर की गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन पानी घटने के बाद जो बर्बादी सामने आ रही है वह खौफनाक है।
जिला प्रशासन की प्रारंभिक समीक्षा के अनुसार, जिले में बुनियादी ढांचे, कृषि और सार्वजनिक संपत्ति को 1,000 करोड़ के करीब नुकसान होने का अनुमान है। जिले के विभिन्न प्रखंडों की 92 से अधिक पंचायतें, 376 गांव और 437 वार्ड पूरी तरह बाढ़ की चपेट में आ चुके हैं। जिले की 9.50 लाख से अधिक की आबादी सीधे तौर पर इस विभीषिका से प्रभावित हुई है।
दियारा और मैदानी इलाकों में हजारों एकड़ में लगी धान, मक्का और सब्जियों की फसलें पूरी तरह सड़ चुकी हैं। गोभी और अन्य नकदी फसलों की लागत डूबने से किसानों की कमर टूट गई है। पटना-भागलपुर रूट पर स्थित एन एच-80 भवनाथपुर के पास सड़क पर 2 फीट तक पानी चढ़ने के कारण लगातार कई दिनों तक बंद रहा।
इसके अलावा, निर्माणाधीन मुंगेर-मिर्जाचौकी ग्रीनफील्ड फोरलेन पर भी पानी भर जाने से यातायात बुरी तरह बाधित हुआ है। नवगछिया अनुमंडल के रंगड़ा चौक प्रखंड अंतर्गत बनिया गांव में कोसी नदी के भीषण दबाव के कारण पुरानी रेलवे लाइन का तटबंध लगभग 15 मीटर तक टूट गया, जिससे कई नए गांवों में पानी फैल गया।
सबसे दर्दनाक हादसा बाईपास थाना क्षेत्र के कोयली खटहा गांव में हुआ, जहां बाढ़ के पानी से भरे गड्ढे में डूबने से एक ही परिवार के 4 बच्चों सहित 5 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई। बाढ़ की गंभीरता को देखते हुए हाल ही में बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नवगछिया के काजीकोरैया तटबंध का हवाई सर्वे किया और राहत शिविरों का जायजा लिया।
जिला प्रशासन का दावा है कि प्रभावितों के लिए 317 से अधिक सामुदायिक रसोई संचालित किए जा रहे हैं, जिनमें लाखों लोगों को भोजन पैकेट दिए गए हैं। जलस्तर में कमी आने के साथ ही प्रभारी मंत्री नीतीश मिश्रा ने घोषणा की है कि पानी पूरी तरह उतरते ही नुकसान का विस्तृत सर्वे कराकर पीड़ितों को तत्काल सहायता दी जाएगी। भले ही कागजों पर राहत का खेल चल रहा हो, लेकिन धरातल पर भारी प्रशासनिक चूक उजागर हुई है।
बाढ़ प्रभावित ग्रामीणों में ग्रीनफील्ड फोरलेन के निर्माण को लेकर भारी आक्रोश है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि अधिकारियों को क्षेत्र के जलजमाव इतिहास की जानकारी होने के बावजूद सड़क का स्तर काफी नीचे रखा गया, जिससे मामूली उफान में ही यह मुख्य मार्ग डूब गया। राघोपुर-काजीकोरैया तटबंध की मरम्मत को लेकर जल संसाधन विभाग की लापरवाही एक बार फिर सामने आई है।
जानकारों का कहना है कि समय रहते गाद की सफाई और बांधों को सुदृढ़ न किए जाने के कारण करोड़ों रुपये का यह सुरक्षा चक्र ताश के पत्तों की तरह ढह गया। ग्रामीण इलाकों से लगातार शिकायतें आ रही हैं कि बाढ़ पीड़ितों के लिए तिरपाल और सूखा राशन केवल मुख्य सड़कों के किनारे रहने वाले लोगों तक सीमित है, जबकि सुदूर दियारा के गांवों में फंसे लोग आज भी दाने-दाने को तरस रहे हैं।
वहीं प्रभारी मंत्री नीतीश मिश्रा की समीक्षा बैठक में भले ही कागजी राहत के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हों, लेकिन जिले के चार सबसे बड़े प्रभावित अंचलों से आ रही जमीनी रिपोर्ट बेहद डरावनी है। प्रशासन की सुस्ती और गलत प्लानिंग की सजा लाखों लोग भुगत रहे हैं।
नवगछिया इस बार बाढ़ की सबसे वीभत्स त्रासदी झेल रहा है। रंगरा चौक प्रखंड के बनिया गांव में पुरानी रेलवे लाइन का तटबंध टूटने से खरीक और नवगछिया के दर्जनों नए इलाकों में पानी तेजी से घुस गया। काजीकोरैया-राघोपुर बांध पर सिल्टेशन (गाद) के कारण नदी की धारा का सीधे टकराना जल संसाधन विभाग की लापरवाही का जीता-जागता सबूत है। यहाँ के सैकड़ों किसान, जो मुख्य रूप से मक्का और केले की खेती पर निर्भर थे, पूरी तरह बर्बाद हो चुके हैं।
मवेशियों के लिए चारा नहीं है और एनएच-31 के किनारे हजारों लोग बिना छत के रहने को मजबूर हैं। नाथनगर के दियारा क्षेत्र की स्थिति बदतर है। रत्तीपुर, दिलदारपुर, भतोरिया सहित दर्जनों पंचायतों का प्रखंड मुख्यालय से संपर्क पूरी तरह भंग हो चुका है। नाथनगर-मधुसूदनपुर मुख्य मार्ग पर कई फीट पानी बहने के कारण आवागमन ठप है।
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि यहाँ प्रशासन की नावें समय पर नहीं पहुँच रही हैं। आवश्यक दवाओं और बच्चों के लिए दूध की भारी किल्लत है। चापाकल डूब जाने के कारण लोग बाढ़ के दूषित पानी को ही छानकर पीने को विवश हैं, जिससे जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। कृषि अनुसंधान और नकदी फसलों का विनाशसिल्क सिटी के करीब सबौर प्रखंड का इलाका जलमग्न है।
बिहार कृषि विश्वविद्यालय के आस-पास के क्षेत्रों से लेकर ममलखा और रजंदीपुर तक बाढ़ का पानी फैला हुआ है। सबौर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर होने वाली गोभी, कद्दू और हरी मिर्च की खेती 100% नष्ट हो चुकी है। किसानों का कहना है कि वे महाजनों से कर्ज लेकर खेती किए थे, जो अब पूरी तरह पानी में बह गई है। एनएच-80 पर जलजमाव के कारण सबौर से घोघा की तरफ जाने वाला यातायात पूरी तरह प्रभावित रहा, जिससे स्थानीय व्यापार ठप हो गया है।
वहीं कहलगांव में गंगा के उफान ने शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों को अपनी चपेट में ले लिया है। कहलगांव शहर के निचले इलाकों सहित एनटीपीसी परिसर के आस-पास के क्षेत्रों में पानी भरने से स्थानीय जनजीवन बेपटरी हो गया है। सबसे बड़ी नाकामी एनएच-80 के भवनाथपुर और घोघा के पास दिखी, जहां सड़क पर पानी चढ़ने के कारण मालवाहक वाहनों की लंबी कतारें लग गईं।
अंतीचक और बटेश्वरस्थान जाने वाले संपर्क मार्ग भी क्षतिग्रस्त हो चुके हैं, जिससे पर्यटन और स्थानीय परिवहन को भारी वित्तीय नुकसान पहुँचा है। उल्लेखनीय है कि भागलपुर में बाढ़ कोई आकस्मिक दैवीय आपदा नहीं है। यह हर साल आने वाली एक तयशुदा त्रासदी है, जिसकी तारीखें कैलेंडर में लगभग दर्ज होती हैं। इसके बावजूद, इस साल भी गंगा और कोसी के उफान ने अगर 9.5 लाख की आबादी को घुटनों पर ला दिया है, तो यह प्रकृति का प्रकोप कम और प्रशासनिक संवेदनहीनता का क्रूर प्रदर्शन अधिक है।
प्रभारी मंत्री नीतीश मिश्रा की समाहरणालय में हुई मैराथन बैठक और हवाई सर्वे के दौर एक रस्म अदायगी जैसे लगते हैं। बैठक के आंकड़ों में 317 कम्युनिटी किचन और 7,000 की तात्कालिक आर्थिक मदद की बातें सुनने में भले ही राहतकारी लगें, लेकिन धरातल पर तंबू ताने बैठे पीड़ित परिवारों से पूछिए कि क्या चंद दिनों की खिचड़ी और कुछ हजार रुपये उनके बह गए आशियाने और मक्के-केले की सड़ी हुई फसलों का मुआवजा हो सकते हैं? इस त्रासदी का सबसे शर्मनाक पहलू इंजीनियरिंग और प्लानिंग की विफलता है।
जब जल संसाधन विभाग को पहले से ज्ञात था कि काजीकोरैया-राघोपुर बांध के पास भारी सिल्टेशन हो रहा है, जिससे नदी की धारा 90 डिग्री मुड़कर बांध पर प्रहार करेगी, तो समय रहते ड्रेजिंग क्यों नहीं की गई? करोड़ों-अरबों की लागत से बन रहे मुंगेर-मिर्जाचौकी ग्रीनफील्ड फोरलेन और एनएच-80 का पानी में डूब जाना यह साफ दर्शाता है कि हमारे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में बाढ़ प्रबंधन के ककहरे को भी शामिल नहीं किया जाता।
त्रासदी के बाद मुआवजा बांटना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि अपनी नाकामियों को ढंकने का एक खर्चीला तरीका है। भागलपुर को कागजी समीक्षाओं और तात्कालिक राहत पैकेजों की नहीं, बल्कि गाद प्रबंधन, मजबूत वॉटर-ड्रेनेज मास्टरप्लान और तटबंधों के स्थाई सुदृढ़ीकरण की जरूरत है।
अगर सरकार और प्रशासन अब भी अपनी दीर्घकालिक नीतिगत सुस्ती से नहीं जागे, तो अगले साल फिर एक बैठक होगी, फिर कुछ सौ करोड़ के नुकसान का दावा होगा, और जनता इसी तरह सैलाब में अपनी तकदीर बहते देखने को मजबूर होगी।